सूरह अत-तौबा
وَعَلَى ٱلثَّلَـٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُوا۟ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ ٱلْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ أَنفُسُهُمْ وَظَنُّوٓا۟ أَن لَّا مَلْجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيْهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُوٓا۟ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ
Wa ‘alaṡ-ṡalāṡatil-lażīna khullifū, ḥattā iżā ḍāqat ‘alaihimul-arḍu bimā raḥubat wa ḍāqat ‘alaihim anfusuhum wa ẓannū allā malja'a minallāhi illā ilaih(i), ṡumma tāba ‘alaihim liyatūbū, innallāha huwat-tawwābur-raḥīm(u).
और उन तीनों पर भी जो पीछे छोड़ दिए गए थे, यहाँ तक कि जब धरती विशाल होते हुए भी उनपर तंग हो गई और उनके प्राण उनपर दुभर हो गए और उन्होंने समझा कि अल्लाह से बचने के लिए कोई शरण नहीं मिल सकती है तो उसी के यहाँ। फिर उसने उनपर कृपा-दृष्टि की ताकि वे पलट आएँ। निस्संदेह अल्लाह ही तौबा क़बूल करनेवाला, अत्यन्त दयावान है
📝 टिप्पणी
338) वे तीन व्यक्ति कअब बिन मालिक, हिलाल बिन उमैया और मरारा बिन रबीअ थे। उन्हें इसलिए दोषी ठहराया गया क्योंकि उन्होंने तबूक के युद्ध (ग़ज़वा-ए-तबूक) में भाग नहीं लिया था।