सूरह अत-तौबा
وَمِمَّنْ حَوْلَكُم مِّنَ ٱلْأَعْرَابِ مُنَـٰفِقُونَ ۖ وَمِنْ أَهْلِ ٱلْمَدِينَةِ ۖ مَرَدُوا۟ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ ۖ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ ۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٍ
Wa mimman ḥaulakum minal-a‘rābi munāfiqūn(a),wa min ahlil-madīnati maradū ‘alan nifāq(i), lā ta‘lamuhum, naḥnu na‘lamuhum, sanu‘ażżibuhum marrataini ṡumma yuraddūna ilā ‘ażābin ‘aẓīm(in).
और तुम्हारे आस-पास के बद्दुनओं में और मदीनावालों में कुछ ऐसे कपटाचारी है जो कपट-नीति पर जमें हुए है। उनको तुम नहीं जानते, हम उन्हें भली-भाँति जानते है। शीघ्र ही हम उन्हें दो बार यातना देंगे। फिर वे एक बड़ी यातना की ओर लौटाए जाएँगे
📝 टिप्पणी
331) पहली बार, वे नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और मुसलमानों से हार गए; और दूसरी बार, अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) द्वारा उनके पाखंड (मुनाफ़क़त) को उजागर कर दिया गया। इसका यह भी अर्थ लगाया जा सकता है कि पहला अज़ाब (दंड) दुनिया का अज़ाब है और दूसरा क़ब्र का अज़ाब है, क्योंकि यह आयत आख़िरत (परलोक) के अज़ाब की पुष्टि के साथ समाप्त होती है (ṡumma yuraddūna ilā ‘ażābin ‘aẓīm)।