सूरह अत-तौबा
ٱتَّخَذُوٓا۟ أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَـٰنَهُمْ أَرْبَابًا مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَٱلْمَسِيحَ ٱبْنَ مَرْيَمَ وَمَآ أُمِرُوٓا۟ إِلَّا لِيَعْبُدُوٓا۟ إِلَـٰهًا وَٰحِدًا ۖ لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ عَمَّا يُشْرِكُونَ
Ittakhażū aḥbārahum wa ruhbānahum arbābam min dūnillāhi wal-masīḥabna maryam(a), wa mā umirū illā liya‘budū ilāhaw wāḥidā(n), lā ilāha illā huw(a), subḥānahū ‘ammā yusyrikūn(a).
उन्होंने अल्लाह से हटकर अपने धर्मज्ञाताओं और संसार-त्यागी संतों और मरयम के बेटे ईसा को अपने रब बना लिए है - हालाँकि उन्हें इसके सिवा और कोई आदेश नहीं दिया गया था कि अकेले इष्टि-पूज्य की वे बन्दगी करें, जिसक सिवा कोई और पूज्य नहीं। उसकी महिमा के प्रतिकूल है वह शिर्क जो ये लोग करते है। -
📝 टिप्पणी
325) इसका अर्थ यह है कि उन्होंने अपने रब्बियों (विद्वानों) और भिक्षुओं (राहिबों) द्वारा निर्धारित की गई शिक्षाओं का पालन किया, भले ही वे अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) के आदेशों के विपरीत थीं।