सूरह अल-क़सस

أُو۟لَـٰٓئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا۟ وَيَدْرَءُونَ بِٱلْحَسَنَةِ ٱلسَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ يُنفِقُونَ

Ulā'ika yu'tauna ajrahum marrataini bimā ṣabarū wa yadra'ūna bil-ḥasanatis-sayyi'ata wa mimmā razaqnāhum yunfiqūn(a).

ये वे लोग है जिन्हें उनका प्रतिदान दुगना दिया जाएगा, क्योंकि वे जमे रहे और भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते है और जो कुछ रोज़ी हमने उन्हें दी हैं, उसमें से ख़र्च करते है

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