सूरह अज़-ज़ुमर

وَمَا قَدَرُوا۟ ٱللَّهَ حَقَّ قَدْرِهِۦ وَٱلْأَرْضُ جَمِيعًا قَبْضَتُهُۥ يَوْمَ ٱلْقِيَـٰمَةِ وَٱلسَّمَـٰوَٰتُ مَطْوِيَّـٰتٌۢ بِيَمِينِهِۦ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ

Wa mā qadarullāha ḥaqqa qadrih(ī), wal-arḍu jamī‘an qabḍatuhū yaumal-qiyāmati was-samāwātu maṭwiyyātum biyamīnih(ī), subḥānahū wa ta‘ālā ‘ammā yusyrikūn(a).

उन्होंने अल्लाह की क़द्र न जानी, जैसी क़द्र उसकी जाननी चाहिए थी। हालाँकि क़ियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्ठी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटे हुए होंगे। महान और उच्च है वह उससे, जो वे साझी ठहराते है

📝 टिप्पणी
664) यह आयत अल्लाह सुभानहु व तआला की महानता और शक्ति को दर्शाती है और कयामत (प्रलय) के दिन केवल उसी का अधिकार और सत्ता होगी।

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