सूरह अन-निसा

ٱلَّذِينَ يَتَّخِذُونَ ٱلْكَـٰفِرِينَ أَوْلِيَآءَ مِن دُونِ ٱلْمُؤْمِنِينَ ۚ أَيَبْتَغُونَ عِندَهُمُ ٱلْعِزَّةَ فَإِنَّ ٱلْعِزَّةَ لِلَّهِ جَمِيعًا

Al-lażīna yattakhiżūnal-kāfirīna auliyā'a min dūnil-mu'minīn(a), ayabtagūna ‘indahumul-‘izzata fa innal-‘izzata lillāhi jamī‘ā(n).

जो ईमानवालों को छोड़कर इनकार करनेवालों को अपना मित्र बनाते है। क्या उन्हें उनके पास प्रतिष्ठा की तलाश है? प्रतिष्ठा तो सारी की सारी अल्लाह ही के लिए है

📝 टिप्पणी
174) सूरह आले इमरान (3:28) की पाद-टिप्पणी देखें।

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