सूरह अन-निसा
لَّيْسَ بِأَمَانِيِّكُمْ وَلَآ أَمَانِىِّ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ ۗ مَن يَعْمَلْ سُوٓءًا يُجْزَ بِهِۦ وَلَا يَجِدْ لَهُۥ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
Laisa bi'amāniyyikum wa lā amāniyyi ahlil-kitāb(i), may ya‘mal sū'ay yujza bih(ī), wa lā yajid lahū min dūnillāhi waliyyaw wa lā naṣīrā(n).
बात न तुम्हारी कामनाओं की है और न किताबवालों की कामनाओं की। जो भी बुराई करेगा उसे उसका फल मिलेगा और वह अल्लाह से हटकर न तो कोई मित्र पाएगा और न ही सहायक
📝 टिप्पणी
168) कुछ मुफ़स्सिरों (व्याख्याताओं) के अनुसार, इस आयत में "तुम्हारी इच्छाओं/कामनाओं" शब्द से तात्पर्य मुसलमानों से है, जबकि कुछ अन्य का मानना है कि यह शब्द मुशरिकों (बहुदेववादियों) की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ यह है कि आख़िरत (परलोक) का प्रतिफल उनकी इच्छाओं के अनुसार नहीं, बल्कि धर्म के नियमों और प्रावधानों के अनुसार होगा।