सूरह अन-निसा

وَإِنِ ٱمْرَأَةٌ خَافَتْ مِنۢ بَعْلِهَا نُشُوزًا أَوْ إِعْرَاضًا فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِمَآ أَن يُصْلِحَا بَيْنَهُمَا صُلْحًا ۚ وَٱلصُّلْحُ خَيْرٌ ۗ وَأُحْضِرَتِ ٱلْأَنفُسُ ٱلشُّحَّ ۚ وَإِن تُحْسِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ كَانَ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا

Wa inimra'atun khāfat mim ba‘lihā nusyūzan au i‘rāḍan falā junāḥa ‘alaihimā ay yuṣliḥā bainahumā ṣulḥā(n), waṣ-ṣulḥu khair(un), wa uḥḍiratil-anfususy-syuḥḥ(a), wa in tuḥsinū wa tattaqū fa innallāha kāna bimā ta‘malūna khabīrā(n).

यदि किसी स्त्री को अपने पति की और से दुर्व्यवहार या बेरुख़ी का भय हो, तो इसमें उनके लिए कोई दोष नहीं कि वे दोनों आपस में मेल-मिलाप की कोई राह निकाल ले। और मेल-मिलाव अच्छी चीज़ है। और मन तो लोभ एवं कृपणता के लिए उद्यत रहता है। परन्तु यदि तुम अच्छा व्यवहार करो और (अल्लाह का) भय रखो, तो अल्लाह को निश्चय ही जो कुछ तुम करोगे उसकी खबर रहेगी

📝 टिप्पणी
171) पत्नी की ओर से नुशूज़ (अवज्ञा) का अर्थ देखने के लिए सूरह अन-निसा (4:34) की पाद-टिप्पणी देखें। जबकि पति की ओर से नुशूज़ का अर्थ अपनी पत्नी के प्रति कठोर व्यवहार करना, उसके साथ वैवाहिक संबंध न रखना और उसके अधिकारों को न देना है। 172) उदाहरण के लिए, पत्नी अपने कुछ अधिकारों को छोड़ने के लिए तैयार हो जाए बशर्ते कि पति उसके साथ फिर से अच्छे संबंध बनाने और सुलह करने के लिए राज़ी हो। 173) यह मानव स्वभाव का हिस्सा है कि वह स्वेच्छा से अपने अधिकारों का कुछ हिस्सा दूसरों को देने में संकोच करता है। इसके बावजूद, यदि पत्नी अपने कुछ अधिकारों को छोड़ देती है, तो पति के लिए उसे स्वीकार करना वैध है।

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