सूरह अन-निसा

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلنَّاسُ ٱتَّقُوا۟ رَبَّكُمُ ٱلَّذِى خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَٰحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَآءً ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ ٱلَّذِى تَسَآءَلُونَ بِهِۦ وَٱلْأَرْحَامَ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا

Yā ayyuhan-nāsuttaqū rabbakumul-lażī khalaqakum min nafsiw wāḥidatiw wa khalaqa minhā zaujahā wa baṡṡa minhumā rijālan kaṡīraw wa nisā'ā(n), wattaqullāhal-lażī tasā'alūna bihī wal-arḥām(a), innallāha kāna ‘alaikum raqībā(n).

ऐ लोगों! अपने रब का डर रखों, जिसने तुमको एक जीव से पैदा किया और उसी जाति का उसके लिए जोड़ा पैदा किया और उन दोनों से बहुत-से पुरुष और स्त्रियाँ फैला दी। अल्लाह का डर रखो, जिसका वास्ता देकर तुम एक-दूसरे के सामने माँगें रखते हो। और नाते-रिश्तों का भी तुम्हें ख़याल रखना हैं। निश्चय ही अल्लाह तुम्हारी निगरानी कर रहा हैं

📝 टिप्पणी
143) यह आयत इस बात पर ज़ोर देती है कि नबी आदम (अलैहिस्सलाम) और हवा की रचना अन्य जीवों की तरह जैविक विकास (evolution) की प्रक्रिया के माध्यम से नहीं हुई थी, बल्कि उन्हें विशेष रूप से एक अकेले व्यक्ति से रचा गया था, और फिर उन्हीं से उनका जोड़ा बनाया गया। इस प्रक्रिया को विज्ञान द्वारा नहीं समझाया जा सकता है। इसके बाद, उनकी संतानें उनकी इच्छा के अनुसार जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से जोड़ों के रूप में पैदा हुईं।

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