सूरह अन-निसा

إِنَّ ٱلَّذِينَ تَوَفَّىٰهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ ظَالِمِىٓ أَنفُسِهِمْ قَالُوا۟ فِيمَ كُنتُمْ ۖ قَالُوا۟ كُنَّا مُسْتَضْعَفِينَ فِى ٱلْأَرْضِ ۚ قَالُوٓا۟ أَلَمْ تَكُنْ أَرْضُ ٱللَّهِ وَٰسِعَةً فَتُهَاجِرُوا۟ فِيهَا ۚ فَأُو۟لَـٰٓئِكَ مَأْوَىٰهُمْ جَهَنَّمُ ۖ وَسَآءَتْ مَصِيرًا

Innal-lażīna tawaffāhumul-malā'ikatu ẓālimī anfusihim qālū fīma kuntum, qālū kunnā mustaḍ‘afīna fil-arḍ(i), qālū alam takun arḍullāhi wāsi‘atan fa tuhājirū fīhā, fa ulā'ika ma'wāhum jahannam(u), wa sā'at maṣīrā(n).

जो लोग अपने-आप पर अत्याचार करते है, जब फ़रिश्ते उस दशा में उनके प्राण ग्रस्त कर लेते है, तो कहते है, "तुम किस दशा में पड़े रहे?" वे कहते है, "हम धरती में निर्बल और बेबस थे।" फ़रिश्ते कहते है, "क्या अल्लाह की धरती विस्तृत न थी कि तुम उसमें घर-बार छोड़कर कहीं ओर चले जाते?" तो ये वही लोग है जिनका ठिकाना जहन्नम है। - और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है

📝 टिप्पणी
161) यह आयत उन कुछ मुसलमानों के संबंध में नाज़िल हुई थी जिन्होंने मदीना हिजरत नहीं की थी और उन्हें मजबूरी में मुशरिकों की सेना की ओर से बद्र के युद्ध में शामिल होना पड़ा, और फिर वे उस युद्ध में मारे गए (रिवायत: अल-बुखारी)।

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