सूरह अन-निसा
إِنَّآ أَنزَلْنَآ إِلَيْكَ ٱلْكِتَـٰبَ بِٱلْحَقِّ لِتَحْكُمَ بَيْنَ ٱلنَّاسِ بِمَآ أَرَىٰكَ ٱللَّهُ ۚ وَلَا تَكُن لِّلْخَآئِنِينَ خَصِيمًا
Innā anzalnā ilaikal-kitāba bil-ḥaqqi litaḥkuma bainan-nāsi bimā arākallāh(u), wa lā takun lil-khā'inīna khaṣīmā(n).
निस्संदेह हमने यह किताब हक़ के साथ उतारी है, ताकि अल्लाह ने जो कुछ तुम्हें दिखाया है उसके अनुसार लोगों के बीच फ़ैसला करो। और तुम विश्वासघाती लोगों को ओर से झगड़नेवाले न बनो
📝 टिप्पणी
164) यह आयत तुअमा नामक व्यक्ति द्वारा की गई चोरी के मामले के संदर्भ में नाज़िल हुई थी। उसने चोरी का सामान एक यहूदी के घर में छुपा दिया और उसी पर चोरी का आरोप लगा दिया। जब तुअमा के रिश्तेदारों ने पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अनुरोध किया कि वे तुअमा का बचाव करें और उस यहूदी को सज़ा दें, तो पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उनकी बातों से प्रभावित होने ही वाले थे कि अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई और उन्हें धोखेबाज़ (ख़ाइन) का पक्ष लेने से मना कर दिया।