सूरह अन-नहल

وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلًا قَرْيَةً كَانَتْ ءَامِنَةً مُّطْمَئِنَّةً يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًا مِّن كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ ٱللَّهِ فَأَذَٰقَهَا ٱللَّهُ لِبَاسَ ٱلْجُوعِ وَٱلْخَوْفِ بِمَا كَانُوا۟ يَصْنَعُونَ

Wa ḍaraballāhu maṡalan qaryatan kānat āminatam muṭma'innatay ya'tīhā rizquhā ragadam min kulli makānin fa kafarat bi'an‘umillāhi fa ażāqahallāhu libāsal-jū‘i wal-khaufi bimā kānū yaṣna‘ūn(a).

अल्लाह ने एक मिसाल बयान की है: एक बस्ती थी जो निश्चिन्त और सन्तुष्ट थी। हर जगह से उसकी रोज़ी प्रचुरता के साथ चली आ रही थी कि वह अल्लाह की नेमतों के प्रति अकृतज्ञता दिखाने लगी। तब अल्लाह ने उसके निवासियों को उनकी करतूतों के बदले में भूख का मज़ा चख़ाया और भय का वस्त्र पहनाया

📝 टिप्पणी
422) भूख और भय ने उन्हें इस तरह घेर लिया जैसे कपड़े शरीर को ढक लेते हैं।

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