सूरह अन-नहल

ٱدْعُ إِلَىٰ سَبِيلِ رَبِّكَ بِٱلْحِكْمَةِ وَٱلْمَوْعِظَةِ ٱلْحَسَنَةِ ۖ وَجَـٰدِلْهُم بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِۦ ۖ وَهُوَ أَعْلَمُ بِٱلْمُهْتَدِينَ

Ud‘u ilā sabīli rabbika bil-ḥikmati wal-mau‘iẓatil-ḥasanati wa jādilhum bil-latī hiya aḥsan(u), inna rabbaka huwa a‘lamu biman ḍalla ‘an sabīlihī wa huwa a‘lamu bil-muhtadīn(a).

अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद विवाद करो जो उत्तम हो। तुम्हारा रब उसे भली-भाँति जानता है जो उसके मार्ग से भटक गया और वह उन्हें भी भली-भाँति जानता है जो मार्ग पर है

📝 टिप्पणी
424) हिकमत (बुद्धिमत्ता) से तात्पर्य उस दृढ़ और सच्ची बात से है जो सत्य (हक़) और असत्य (बातिल) के बीच अंतर कर सके।

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