सूरह अन-नहल
وَهُوَ ٱلَّذِى سَخَّرَ ٱلْبَحْرَ لِتَأْكُلُوا۟ مِنْهُ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُوا۟ مِنْهُ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَا وَتَرَى ٱلْفُلْكَ مَوَاخِرَ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا۟ مِن فَضْلِهِۦ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
Wa huwal-lażī sakhkharal-baḥra lita'kulū minhu laḥman ṭariyyaw wa tastakhrijū minhu ḥilyatan talbasūnahā, wa taral-fulka mawākhira fīhi wa litabtagū min faḍlihī wa la‘allakum tasykurūn(a).
वही तो है जिसने समुद्र को वश में किया है, ताकि तुम उससे ताज़ा मांस लेकर खाओ और उससे आभूषण निकालो, जिसे तुम पहनते हो। तुम देखते ही हो कि नौकाएँ उसको चीरती हुई चलती हैं (ताकि तुम सफ़र कर सको) और ताकि तुम उसका अनुग्रह तलाश करो और ताकि तुम कृतज्ञता दिखलाओ
📝 टिप्पणी
413) यहाँ समुद्र (या जल-निकाय) से तात्पर्य पानी के एक विशाल क्षेत्र से है, चाहे वह मीठा हो या खारा, जिसमें समुद्र, झीलें और चौड़ी नदियाँ शामिल हैं।