सूरह अन-नहल
هَلْ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمُ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةُ أَوْ يَأْتِىَ أَمْرُ رَبِّكَ ۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَـٰكِن كَانُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
Hal yanẓurūna illā an ta'tiyahumul-malā'ikatu au ya'tiya amru rabbik(a), każālika fa‘alal-lażīna min qablihim, wa mā ẓalamahumullāhu wa lākin kānū anfusahum yaẓlimūn(a).
क्या अब वे इसी की प्रतीक्षा कर रहे है कि फ़रिश्ते उनके पास आ पहुँचे या तेरे रब का आदेश ही आ जाए? ऐसा ही उन लोगो ने भी किया, जो इनसे पहले थे। अल्लाह ने उनपर अत्याचार नहीं किया, किन्तु वे स्वयं अपने ऊपर अत्याचार करते रहे
📝 टिप्पणी
415) इसका तात्पर्य उनके प्राण (रूढ़) निकालने के लिए फ़रिश्तों का आना है। 416) इसका तात्पर्य उन्हें नष्ट करने के लिए अल्लाह सुब्हानहू व तआला के अज़ाब (प्रकोप) का आना है।