सूरह अल-अंबिया

لَا يَسْمَعُونَ حَسِيسَهَا ۖ وَهُمْ فِى مَا ٱشْتَهَتْ أَنفُسُهُمْ خَـٰلِدُونَ

Lā yasma‘ūna ḥasīsahā, wa hum fīmasytahat anfusuhum khālidūn(a).

वे उसकी आहट भी नहीं सुनेंगे और अपनी मनचाही चीज़ों के मध्य सदैव रहेंगे

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