सूरह अल-अंबिया
وَذَا ٱلنُّونِ إِذ ذَّهَبَ مُغَـٰضِبًا فَظَنَّ أَن لَّن نَّقْدِرَ عَلَيْهِ فَنَادَىٰ فِى ٱلظُّلُمَـٰتِ أَن لَّآ إِلَـٰهَ إِلَّآ أَنتَ سُبْحَـٰنَكَ إِنِّى كُنتُ مِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ
Wa żan-nūni iż żahaba mugāḍiban fa ẓanna allan naqdira ‘alaihi fa nādā fiẓ-ẓulumāti allā ilāha illā anta subḥānaka innī kuntu minaẓ-ẓālimīn(a).
और ज़ुन्नून (मछलीवाले) पर भी दया दर्शाई। याद करो जबकि वह अत्यन्त क्रद्ध होकर चल दिया और समझा कि हम उसे तंगी में न डालेंगे। अन्त में उसनें अँधेरों में पुकारा, "तेरे सिवा कोई इष्ट-पूज्य नहीं, महिमावान है तू! निस्संदेह मैं दोषी हूँ।"
📝 टिप्पणी
493) इससे तात्पर्य तीन अंधेरों से है: मछली के पेट का अंधेरा, गहरे समुद्र का अंधेरा और रात का अंधेरा।