सूरह अल-अनआम

وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا يَـٰمَعْشَرَ ٱلْجِنِّ قَدِ ٱسْتَكْثَرْتُم مِّنَ ٱلْإِنسِ ۖ وَقَالَ أَوْلِيَآؤُهُم مِّنَ ٱلْإِنسِ رَبَّنَا ٱسْتَمْتَعَ بَعْضُنَا بِبَعْضٍ وَبَلَغْنَآ أَجَلَنَا ٱلَّذِىٓ أَجَّلْتَ لَنَا ۚ قَالَ ٱلنَّارُ مَثْوَىٰكُمْ خَـٰلِدِينَ فِيهَآ إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ

Wa yauma yaḥsyuruhum jamī‘ā(n), yā ma‘syaral-jinni qadistakṡartum minal-ins(i), wa qāla auliyā'uhum minal-insi rabbanastamta‘a ba‘ḍunā biba‘ḍiw wa balagnā ajalanal-lażī ajjalta lanā, qālan-nāru maṡwākum khālidīna fīhā illā mā syā'allāh(u), inna rabbaka ḥakīmun ‘alīm(un).

और उस दिन को याद करो, जब वह उन सबको घेरकर इकट्ठा करेगा, (कहेगा), "ऐ जिन्नों के गिरोह! तुमने तो मनुष्यों पर ख़ूब हाथ साफ किया।" और मनुष्यों में से जो उनके साथी रहे होंगे, कहेंग, "ऐ हमारे रब! हमने आपस में एक-दूसरे से लाभ उठाया और अपने उस नियत समय को पहुँच गए, जो तूने हमारे लिए ठहराया था।" वह कहेगा, "आग (नरक) तुम्हारा ठिकाना है, उसमें तुम्हें सदैव रहना है।" अल्लाह का चाहा ही क्रियान्वित है। निश्चय ही तुम्हारा रब तत्वदर्शी, सर्वज्ञ है

📝 टिप्पणी
260) "वली" और "औलिया" शब्दों के अर्थ के संबंध में, कृपया सूरा आलि इमरान/3: 28 का पाद-टिप्पणी (फुटनोट) देखें। 261) उनमें से प्रत्येक ने एक-दूसरे से लाभ (और आनंद) उठाया है। जिन्न (शैतानी ताकतें) मनुष्यों को गुमराह करने में सफल होने पर प्रसन्न महसूस करते हैं, जबकि मनुष्य जिन्नों के बहकावे में आने और सांसारिक सुखों का खुलकर आनंद लेने में खुशी महसूस करते हैं।

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