सूरह अल-अनआम
وَمَا مِن دَآبَّةٍ فِى ٱلْأَرْضِ وَلَا طَـٰٓئِرٍ يَطِيرُ بِجَنَاحَيْهِ إِلَّآ أُمَمٌ أَمْثَالُكُم ۚ مَّا فَرَّطْنَا فِى ٱلْكِتَـٰبِ مِن شَىْءٍ ۚ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يُحْشَرُونَ
Wa mā min dābbatin fil-arḍi wa lā ṭā'iriy yaṭīru bijanāḥaihi illā umamun amṡālukum, mā farraṭnā fil-kitābi min syai'in ṡumma ilā rabbihim yuḥsyarūn(a).
धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे
📝 टिप्पणी
242) जीवित प्राणी होने के नाते, जानवरों में मनुष्यों के साथ जैविक (biological) समानताएं होती हैं, और कुछ में तो नेतृत्व के साथ मानव समाजों जैसी सामाजिक व्यवस्था भी होती है। 243) कुछ मुफ़स्सिरों (व्याख्याताओं) ने "किताब" का अर्थ लौह-ए-महफ़ूज़ लिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सभी प्राणियों का भाग्य उसमें लिखा (तय किया) जा चुका है। वहीं कुछ अन्य ने इसकी व्याख्या अल-क़ुरआन के रूप में की है, जिसका अर्थ यह है कि क़ुरआन में धर्म के मूल सिद्धांत, मानदंड, नियम, हिकमत (बुद्धिमत्ता) और दुनिया और आख़िरत में मानव कल्याण के मार्गदर्शन शामिल हैं।