सूरह अल-अनआम
وَأَقْسَمُوا۟ بِٱللَّهِ جَهْدَ أَيْمَـٰنِهِمْ لَئِن جَآءَتْهُمْ ءَايَةٌ لَّيُؤْمِنُنَّ بِهَا ۚ قُلْ إِنَّمَا ٱلْـَٔايَـٰتُ عِندَ ٱللَّهِ ۖ وَمَا يُشْعِرُكُمْ أَنَّهَآ إِذَا جَآءَتْ لَا يُؤْمِنُونَ
Wa aqsamū billāhi jahda aimānihim la'in jā'athum āyatul layu'minunna bihā, qul innamal-āyātu ‘indallāhi wa mā yusy‘irukum annahā iżā jā'at lā yu'minūn(a).
वे लोग तो अल्लाह की कड़ी-कड़ी क़समें खाते है कि यदि उनके पास कोई निशानी आ जाए, तो उसपर वे अवश्य ईमान लाएँगे। कह दो, "निशानियाँ तो अल्लाह ही के पास है।" और तुम्हें क्या पता कि जब वे आ जाएँगी तो भी वे ईमान नहीं लाएँगे
📝 टिप्पणी
257) मुशरिकों (बहुदेववादियों) ने क़सम खाई कि यदि अल्लाह की ओर से कोई मोजिज़ा (चमत्कार) आया, तो वे अवश्य ईमान ले आएँगे। इसलिए, मोमिनों (विश्वास करने वालों) को यह उम्मीद थी कि काश नबी अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) से उस मोजिज़े के अवतरण की दुआ करें। अतः, अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) ने इस आयत के माध्यम से मोमिनों की उस उम्मीद को ख़ारिज (अस्वीकार) कर दिया।