सूरह अल-अराफ़

ٱلَّذِينَ يَتَّبِعُونَ ٱلرَّسُولَ ٱلنَّبِىَّ ٱلْأُمِّىَّ ٱلَّذِى يَجِدُونَهُۥ مَكْتُوبًا عِندَهُمْ فِى ٱلتَّوْرَىٰةِ وَٱلْإِنجِيلِ يَأْمُرُهُم بِٱلْمَعْرُوفِ وَيَنْهَىٰهُمْ عَنِ ٱلْمُنكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ ٱلطَّيِّبَـٰتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ ٱلْخَبَـٰٓئِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ إِصْرَهُمْ وَٱلْأَغْلَـٰلَ ٱلَّتِى كَانَتْ عَلَيْهِمْ ۚ فَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ بِهِۦ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَٱتَّبَعُوا۟ ٱلنُّورَ ٱلَّذِىٓ أُنزِلَ مَعَهُۥٓ ۙ أُو۟لَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ

Al-lażīna yattabi‘ūnar-rasūlan nabiyyal-ummiyyal-lażī yajidūnahū maktūban ‘indahum fit-taurāti wal-injīli ya'muruhum bil-ma‘rūfi wa yanhāhum ‘anil-munkari wa yuḥillu lahumuṭ-ṭayyibāti wa yuḥarrimu ‘alaihimul-khabā'iṡa wa yaḍa‘u ‘anhum iṣrahum wal-aglālal-latī kānat ‘alaihim, fal-lażīna āmanū bihī wa ‘azzarūhu wa naṣarūhu wattaba‘un nūral-lażī unzila ma‘ah(ū), ulā'ika humul-mufliḥūn(a).

"(तो आज इस दयालुता के अधिकारी वे लोग है) जो उस रसूल, उम्मी नबी का अनुसरण करते है, जिसे वे अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा पाते है। और जो उन्हें भलाई का हुक्म देता और बुराई से रोकता है। उनके लिए अच्छी-स्वच्छ चीज़ों का हलाल और बुरी-अस्वच्छ चीज़ों का हराम ठहराता है और उनपर से उनके वह बोझ उतारता है, जो अब तक उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है, जिनमें वे जकड़े हुए थे। अतः जो लोग उसपर ईमान लाए, उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उस प्रकाश के अनुगत हुए, जो उसके साथ अवतरित हुआ है, वही सफलता प्राप्त करनेवाले है।"

📝 टिप्पणी
288) पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शरीयत (कानून) में अब वे भारी बोझ और सख्तियाँ नहीं रह गई हैं जो बनी इस्राईल पर लादी गई थीं, जैसे कि तौबा (पश्चाताप) के लिए आत्महत्या (या स्वयं को मार डालने) की शर्त, जानबूझकर की गई हत्या में दियत (मुआवज़ा/खून-बहा) के विकल्प के बिना अनिवार्य क़िसास (बदला) का होना, गुनाह करने वाले अंग को काट देना, और अपवित्रता (नजासत) लग जाने पर कपड़े को फेंक देना या उस हिस्से को काट देना।

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