सूरह अल-अराफ़

إِنَّ ٱلَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِۦ وَيُسَبِّحُونَهُۥ وَلَهُۥ يَسْجُدُونَ ۩

Innal-lażīna ‘inda rabbika lā yastakbirūna ‘an ‘ibādatihī wa yusabbiḥūnahū wa lahū yasjudūn(a).

निस्संदेह जो तुम्हारे रब के पास है, वे उसकी बन्दगी के मुक़ाबले में अहंकार की नीति नहीं अपनाते; वे तो उसकी तसबीह (महिमागान) करते है और उसी को सजदा करते है

📝 टिप्पणी
303) यह सजदा की आयतों (आयात अस-सजदा) में से एक है, जिसे पढ़ने या सुनने के बाद हमारे लिए सजदा करना सुन्नत (अनुशंसित) है, चाहे नमाज़ के भीतर हो या नमाज़ के बाहर। इस सजदे को "सजदा-ए-तिलावत" कहा जाता है।

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