सूरह अल-अराफ़
فَلَمَّآ ءَاتَىٰهُمَا صَـٰلِحًا جَعَلَا لَهُۥ شُرَكَآءَ فِيمَآ ءَاتَىٰهُمَا ۚ فَتَعَـٰلَى ٱللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ
Falammā ātāhumā ṣāliḥan ja‘alā lahū syurakā'a fīmā ātāhumā, fa ta‘ālallāhu ‘ammā yusyrikūn(a).
किन्तु उसने जब उन्हें भला-चंगा (बच्चा) प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे, जो साझी वे ठहराते है
📝 टिप्पणी
300) मुशरिकों (मूर्तिपूजकों) की दृष्टि में, उनके बच्चों का जन्म केवल अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) की कृपा नहीं थी, बल्कि उन मूर्तियों का आशीर्वाद भी था जिनकी वे पूजा करते थे। इसी कारण वे अपने बच्चों के नाम अब्दुल उज़्ज़ा (उज़्ज़ा का सेवक), अब्दू मनात (मनात का सेवक), अब्दुश शम्स (सूर्य का सेवक) आदि रखते थे।