सूरह यूसुफ

وَكَأَيِّن مِّنْ ءَايَةٍ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ يَمُرُّونَ عَلَيْهَا وَهُمْ عَنْهَا مُعْرِضُونَ

Wa ka'ayyim min āyatin fis-samāwāti wal-arḍi yamurrūna ‘alaihā wa hum ‘anhā mu‘rḍūn(a).

आकाशों और धरती में कितनी ही निशानियाँ हैं, जिनपर से वे इस तरह गुज़र जाते है कि उनकी ओर वे ध्यान ही नहीं देते

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