सूरह यूसुफ

وَدَخَلَ مَعَهُ ٱلسِّجْنَ فَتَيَانِ ۖ قَالَ أَحَدُهُمَآ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَعْصِرُ خَمْرًا ۖ وَقَالَ ٱلْـَٔاخَرُ إِنِّىٓ أَرَىٰنِىٓ أَحْمِلُ فَوْقَ رَأْسِى خُبْزًا تَأْكُلُ ٱلطَّيْرُ مِنْهُ ۖ نَبِّئْنَا بِتَأْوِيلِهِۦٓ ۖ إِنَّا نَرَىٰكَ مِنَ ٱلْمُحْسِنِينَ

Wa dakhala ma‘ahus-sijna fatayān(i), qāla aḥaduhumā innī arānī a‘ṣiru khamrā(n), wa qālal-ākharu innī arānī aḥmilu fauqa ra'sī khubzan ta'kuluṭ-ṭairu minh(u), nabbi'nā bita'wīlih(ī), innā narāka minal-muḥsinīn(a).

कारागार में दो नव युवकों ने भी उसके साथ प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहा, "मैंने स्वप्न देखा है कि मैं शराब निचोड़ रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मैंने देखा कि मैं अपने सिर पर रोटियाँ उठाए हुए हूँ, जिनको पक्षी खा रहे है। हमें इसका अर्थ बता दीजिए। हमें तो आप बहुत ही नेक नज़र आते है।"

📝 टिप्पणी
370) एक कथन (रवायत) के अनुसार, वे दोनों युवक राजा के सेवक (ग़ुलाम) थे।

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