सूरह यूसुफ
وَلَقَدْ هَمَّتْ بِهِۦ ۖ وَهَمَّ بِهَا لَوْلَآ أَن رَّءَا بُرْهَـٰنَ رَبِّهِۦ ۚ كَذَٰلِكَ لِنَصْرِفَ عَنْهُ ٱلسُّوٓءَ وَٱلْفَحْشَآءَ ۚ إِنَّهُۥ مِنْ عِبَادِنَا ٱلْمُخْلَصِينَ
Wa laqad hammat bihī wa hamma bihā lau lā ar ra'ā burhāna rabbih(ī), każālika linaṣrifa ‘anhus-sū'a wal-faḥsyā'(a), innahū min ‘ibādinal-mukhlaṣīn(a).
उसने उसका इरादा कर लिया था। यदि वह अपने रब का स्पष्ट॥ प्रमाण न देख लेता तो वह भी उसका इरादा कर लेता। ऐसा इसलिए हुआ ताकि हम बुराई और अश्लीलता को उससे दूर रखें। निस्संदेह वह हमारे चुने हुए बन्दों में से था
📝 टिप्पणी
369) यह आयत यह नहीं दर्शाती कि पैगंबर यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) उस महिला के प्रति कोई बुरा इरादा रखते थे; बल्कि यह इस बात को उजागर करती है कि वह प्रलोभन इतना बड़ा था कि यदि अल्लाह तआला पर उनके विश्वास ने उन्हें दृढ़ता न दी होती, तो वे निश्चित ही पाप (गुनाह) में पड़ जाते।