सूरह यूसुफ
قَالَ مَا خَطْبُكُنَّ إِذْ رَٰوَدتُّنَّ يُوسُفَ عَن نَّفْسِهِۦ ۚ قُلْنَ حَـٰشَ لِلَّهِ مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ مِن سُوٓءٍ ۚ قَالَتِ ٱمْرَأَتُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْـَٔـٰنَ حَصْحَصَ ٱلْحَقُّ أَنَا۠ رَٰوَدتُّهُۥ عَن نَّفْسِهِۦ وَإِنَّهُۥ لَمِنَ ٱلصَّـٰدِقِينَ
Qāla mā khaṭbukunna iż rāwattunna yūsufa ‘an nafsih(ī), qulna ḥāsya lillāhi mā ‘alimnā ‘alaihi min sū'(in), qālatimra'atul-‘azīzil-āna ḥaṣḥaṣal-ḥaqq(u), ana rāwattuhū ‘an nafsihī wa innahū laminaṣ-ṣādiqīn(a).
उसने कहा, "तुम स्त्रियों का क्या हाल था, जब तुमने यूसुफ़ को रिझाने की चेष्टा की थी?" उन्होंने कहा, "पाक है अल्लाह! हम उसमें कोई बुराई नहीं जानते है।" अज़ीज़ की स्त्री बोल उठी, "अब तो सत्य प्रकट हो गया है। मैंने ही उसे रिझाना चाहा था। वह तो बिलकुल सच्चा है।"
📝 टिप्पणी
371) यहाँ "मामले" (या स्थिति) से तात्पर्य उन महिलाओं की पैगंबर यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के बारे में राय से है कि क्या वे उस प्रलोभन से प्रभावित हुए थे या नहीं।