सूरह अल-कहफ़

ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِىٓ أَنزَلَ عَلَىٰ عَبْدِهِ ٱلْكِتَـٰبَ وَلَمْ يَجْعَل لَّهُۥ عِوَجَا ۜ

Al-ḥamdu lillāhil-lażī anzala ‘alā ‘abdihil-kitāba wa lam yaj‘al lahū ‘iwajā(n).

प्रशंसा अल्लाह के लिए है जिसने अपने बन्दे पर यह किताब अवतरित की और उसमें (अर्थात उस बन्दे में) कोई टेढ़ नहीं रखी,

📝 टिप्पणी
442) क़ुरआन में कोई भी परस्पर विरोधी अर्थ नहीं है और न ही सत्य से कोई विचलन (भटकाव) है।

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