सूरह अल-कहफ़
وَمَا مَنَعَ ٱلنَّاسَ أَن يُؤْمِنُوٓا۟ إِذْ جَآءَهُمُ ٱلْهُدَىٰ وَيَسْتَغْفِرُوا۟ رَبَّهُمْ إِلَّآ أَن تَأْتِيَهُمْ سُنَّةُ ٱلْأَوَّلِينَ أَوْ يَأْتِيَهُمُ ٱلْعَذَابُ قُبُلًا
Wa mā mana‘an-nāsa ay yu'minū iż jā'ahumul-hudā wa yastagfirū rabbahum illā an ta'tiyahum sunnatul-awwalīna au ya'tiyahumul-‘ażābu qubulā(n).
आख़िर लोगों को, जबकि उनके पास मार्गदर्शन आ गया, तो इस बात से कि वे ईमान लाते और अपने रब से क्षमा चाहते, इसके सिवा किसी चीज़ ने नहीं रोका कि उनके लिए वही कुछ सामने आए जो पूर्व जनों के सामने आ चुका है, यहाँ तक कि यातना उनके सामने आ खड़ी हो
📝 टिप्पणी
450) अल्लाह सुब्हानहू व तआला के अज़ाब (दंड) के रूपों में से एक यह भी है जो सीधे पापी बंदे को तुरंत नहीं दिया जाता, बल्कि अल्लाह सुब्हानहू व तआला की इच्छा के अनुसार उसे टाल (विलंबित कर) दिया जाता है।