सूरह अल-कहफ़

حَتَّىٰٓ إِذَا بَلَغَ مَغْرِبَ ٱلشَّمْسِ وَجَدَهَا تَغْرُبُ فِى عَيْنٍ حَمِئَةٍ وَوَجَدَ عِندَهَا قَوْمًا ۗ قُلْنَا يَـٰذَا ٱلْقَرْنَيْنِ إِمَّآ أَن تُعَذِّبَ وَإِمَّآ أَن تَتَّخِذَ فِيهِمْ حُسْنًا

Ḥattā iżā balaga magribasy-syamsi wajadahā tagrubu fī ‘ainin ḥami'atiw wa wajada ‘indahā qaumā(n), qulnā yā żal-qarnaini immā an tu‘ażżiba wa immā an tattakhiża fīhim ḥusnā(n).

यहाँ तक कि जब वह सूर्यास्त-स्थल तक पहुँचा तो उसे मटमैले काले पानी के एक स्रोत में डूबते हुए पाया और उसके निकट उसे एक क़ौम मिली। हमने कहा, "ऐ ज़ुलक़रनैन! तुझे अधिकार है कि चाहे तकलीफ़ पहुँचाए और चाहे उनके साथ अच्छा व्यवहार करे।"

📝 टिप्पणी
453) यहाँ तक कि वह पश्चिमी तट पर पहुँचे, वह स्थान जहाँ ज़ुलक़रनैन ने सूरज को डूबते हुए देखा था।

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